Monday, April 27, 2015

मन

मन

आखिर ये है क्या, मन। 

मन, जो हमें हमेशा परेशान रखता है।

वेदो, पुराणों, उपनिषदों, नीति ग्रन्थों में इसकी ढेरों विवेचना की गयी है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय में भी विचारकों ने मन के उपर हजारों हजार व्याख्यान दिए। 

परन्तु क्या श्रोता समझ सके कि मन का रहस्य है क्या। ये क्या होता है, कहाँ होता है।

मन के गुण धर्म के उपर बहुत कुछ लिखा गया है, बताया गया है। परन्तु मन है क्या?

मन हमारे मस्तिष्क के अवचेतन भाग का वह हिस्सा है जो हमारे व्यक्तित्व का वह रूप होता है जो हमारे जन्मजात गुणों से परिपूर्ण होता है। 

बचपन में जब हमने कुछ भी सीखा नहीं होता, तब हम जो भी करते हैं वो केवल मन से प्रेरित होता है। इसी कारण बाल क्रियाएँ निर्मल, निर्दोष होती हैं। धीरे धीरे प्रत्येक बालक का अपने वातावरण के अनुरूप व्यक्तित्व विकास होता जाता है। इस विकास क्रम में जितना ज्यादा नियमन होता है, चेतन मस्तिष्क उतना ज्यादा तार्किक होता जाता है और मन मस्तिष्क की दूरी उतना अधिक बढ़ती जाती है।

यहीं से सारी समस्याओं की शुरुआत होती है।

कोई हमारे सामने परेशान है, जन्मजात परोपकारी का मन उसकी सहायता के लिए उत्सुक हो जाता है परन्तु उसका तार्किक, व्यवहारिक, विश्लेषक मस्तिष्क अपनी शिक्षा के आधार पर दूसरे के झंझट में पड़ने से रोकेगा।

किसी भी व्यक्ति के वास्तविक गुण उसके मन में ही छिपे रहते हैं। और मानव के स्वाभाविक गुण हैं - दया, प्रेम। इनकी अनुपस्थिति या कहा जाए तो इनका दमन से ही क्रूरता, स्वार्थ, घृणा आदि की उत्पत्ति होती है। अत्यधिक व्यवहारिक और भौतिकवाद से जुड़ी शिक्षा मानव के स्वाभाविक गुणों को दबाती चली जाती है।

तो जब भी कोई निर्णय लेना हो, सर्वप्रथम मन की आवाज़ सुननी चाहिए। आखिर आपको भी पता चलना चाहिए कि किस निर्णय से आपके जीवन में शांति बनी रहेगी।

लेकिन अपने मन या आत्मा की आवाज को कैसे पहचाने?

~सचिन्द्र 'अपुर्ण'~

जीवन में लक्ष्य

जीवन में लक्ष्य का पता होना आवश्यक है। लक्ष्य तुम्हें नदी बनाता है, जो कभी धीमी कभी तेज परन्तु निरन्तर गतिशील रहकर अन्ततः अपने सागर में समा जाती है। ऐसे ही तुम्हें भी पता होना चाहिए कि तुम अपुर्ण ही हो अभी, और लक्ष्य है पुर्णता। उस परमात्मा के अंश हो अभी, लक्ष्य है उसमें विलीन हो जाना।
अनेक मार्ग हैं, सम्प्रदाय हैं, ग्रंथ हैं, प्रतीक हैं, उनके भजन हैं।
और देखो उस करुणानिधान की कृपा, सारे मार्ग उस तक ही जाते हैं। बस ध्यान रखना आवश्यक है कि मार्ग में बहुत से प्रलोभन मिलेंगे, सिद्ध और सिद्धियाँ मिलेंगे, जो तुम्हें बांध कर वापस प्रारंभ पर ला खड़ा करेंगे।

इसलिए सावधानी पूर्वक चलना है, जैसे महिला आग में रोटी सेक लेती है बिना हाथ जलाये ।।
~ सचिन्द्र 'अपुर्ण' ~

आत्मावलोकन

हम प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखते हैं, लेकिन जो सबसे पहले सीखना चाहिए वो जीवन भर नहीं सीख पाते।
वो है आत्मावलोकन
घर से स्कूल तक। क्लब से सत्संग तक। सभी जगह कोई न कोई विद्वान आपके पीछे लगा हुआ है। भौतिक और आध्यात्मिक सफलता के गुप्त सुत्र बरसा रहा है। सब कुछ सीखा दिया लेकिन यह नहीं बताया कि सब बेकार है अगर आप बाहर कुछ और अन्दर कुछ और की नीति पर चलते रहेंगे। आप धोखा दे सकते हैं अपने मन को, दुनिया को लेकिन उसे नहीं जो सर्वशक्तिमान कहलाता है।
ईश्वर भी कहते हैं उसे।
आपको लगता है आपके पास कोई ऐसी शक्ति है कि ईश्वर को केवल वही पता लगेगा जिससे आपकी सीट स्वर्ग में निश्चित हो। ऐसा चैनल जो केवल आपके द्वारा किये गए अच्छे काम का ही प्रसारण करता है।
लेकिन तब सिग्नल गायब होते हैं जब आप पड़ोसी की सुंदर गाड़ी, पत्नी या शानदार घर को देखकर मन ही मन कुढ़ते हो, उसे कोसते और गालियाँ देते हो। जब सड़क, बाज़ार में दिखाई देती लड़कियों के शरीर को वासना से देखा करते हो। जब किसी के द्वारा छोटी सी बात न मानने पर क्रोध से काँपने लगते हो। जब किसी पर अन्याय होता देख कर भी चुपचाप अपने रास्ते निकल जाते हो। अपने शौक और माता पिता की आवश्यकताओं में प्राथमिकता तय नहीं कर पाते।
दिखावटी धार्मिक कार्यक्रम में सबसे आगे बिलकुल कैमरे के सामने होते हो लेकिन अकेले में दो मिनट भी ईश्वर को आत्मिक स्तर पर याद करने में अक्षम पाते हो।
इन दोषों से मुक्त होने का केवल एक उपाय है - आत्मावलोकन। जब भी समय हो, याद करना अपने मानसिक क्रियाकलाप। कुछ गलत दिखाई दे तो उसे न दोहराने का संकल्प लेना। सुधारने का प्रयास करना।
ये बातें सूई की तरह चुभेंगी, पर दुष्कर्मों और दुष्प्रवृत्तियाँ के फोड़े को फोड़ने के लिये यह चुभन जरूरी है अन्यथा दुष्परिणाम तो भोगने ही पड़ेंगे।
~सचिन्द्र 'अपुर्ण'~

अनियंत्रित मन

मन का सबसे बड़ा शत्रु है नियंत्रण। और अनियंत्रित मन आपका सबसे बड़ा शत्रु है।
नियंत्रण से मन का क्या बैर है?
मन की गति सृष्टि में सर्वाधिक होती है। और कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण कर मन मानव को भांति भांति की गतिविधियों में वयस्त रखता है। काम, क्रोध,लोभ मोह आदि केवल मन की गतियाँ ही हैं। आप अपनी इच्छा से लगातार क्रोधित भी नहीं रह सकते। प्रयास करें, थोड़ी देर में स्वतः हंसी आ जायेगी।
मन का सीधा संबंध ध्यान से है।
जैसे ही लगातार किसी एक कार्य पर ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश की जाती है, मन उसका विरोध करना शुरू कर देता है। परिणाम में प्राप्त होता है ध्यानभंग।
अब सभी विद्वानों ने जोर दिया है प्रशिक्षण, अभ्यास और त्याग पर।
लेकिन यह सब इन्द्रिय नियंत्रण की क्रियाएँ हैं। केवल इनपर निर्भर व्यक्ति को कुछ वर्षों के बाद प्राप्त होता है अत्यधिक मात्रा में अवसाद।
दो कारणों से - लगातार अभ्यास के बाद भी जरा से प्रलोभन पर इन्द्रियों का डोल जाना और त्याग की यात्रा में रोज चलने के बाद भी स्वयं को आरंभ में खड़े पाना।
तो जब कोई साधक ये पाता है कि इतने परिश्रम के बाद भी दिखावटी जीवन जीना पड़ रहा है तो या तो वह प्रपंच को ओढ़ लेता है या दूसरे गुरु की तलाश में लग जाता है।
जो नहीं करता वह यह कि इन्द्रिय दमन की बजाय आत्मावलोकन करे और अपने विचारों को शुद्ध करने की ओर अग्रसर हो।
~सचिन्द्र 'अपुर्ण '~

प्रस्तावना : कुछ शब्द

उस परमेश्वर के अंश रूपी प्रत्येक आत्मा प्रणाम
इस ब्लॉग पर जो कुछ भी है, वो मेरी चेतना पर छाये अज्ञान रूपी अंधकार में उत्पन्न कुछ ज्ञान किरणे हैं. ईश्वर कृपा से सद्गुरु का मिलना और सद्गुरु कृपा से ईश्वर से मिलना, दोनों ही मुझ अंश मात्र पर उसकी कृपा है.
यहाँ लिखे किसी भी विचार से आपका सहमत होना नितांत अनावश्यक है. मेरे विचारों को पढ़ कर आपके मन में कुछ विचार उत्पन्न हो, उत्तम. कोई प्रश्न उत्पन्न हो, सर्वोत्तम. सबका स्वागत है.
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आखिर ज्ञान और विचार किसी व्यक्ति निज संपत्ति न तो आज तक हुए हैं और न ही कभी होंगे.
और मैं तो हूँ ही 'अपूर्ण '

आपका धन्यवाद....

सचिन्द्र 'अपूर्ण'
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