तंत्र और मानव जीवन


मानव-जीवन का क्षण-क्षण, पल-पल आवश्यकताओं से घिरा हुआ है कहना चाहिए-मानव-जीवन का आवश्यकताओं को ही-कामना, लालसा, इच्छा, उद्देश्य और लक्ष्य की संज्ञा दी गई है। वस्तुतः लालसा ही मानव जीवन की धुरी है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति, वह रागी-विरागी, ज्ञानी-मूर्ख, त्यागी-गृहस्थ, साधक-संन्यासी, राजा-रंक, चाहे जो भी हो-किसी न किसी आवश्यकता से प्रतिक्षण प्रभावित, प्रेरित और सक्रिय रहता है। आध्यात्मिक-साधना में भी कम से कम एक लालसा आवश्य ही निहित रहती है-इष्टदेव का दर्शन, सामीप्य, सायुज्य अथवा मोक्ष प्राप्ति। लौकिक-जीवन तो पूरी तरह आवश्यकताओं से आच्छादित है। किसी को धन चाहिए, किसी को संतान। किसी को रोग-मुक्ति, किसी को शत्रु-पराभव। मंत्र-यंत्र-तंत्र की समस्त साधना का यही उद्देश्य है-अभीष्ट की प्राप्ति।
इन तीनों प्रकार की साधनाओं में, अपेक्षित उपासना, पूजा, विधि-विधान और फल प्राप्ति का विवेचन करते हुए-मनीषियों ने भौतिक दृष्टि से मानव-जीवन की आवश्यकताओं (कामनाओं) का वर्गीकरण करके तदनुसार प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति हेतु तत्संबंधी साधनाओं को भी श्रेणीबद्ध कर दिया है। लोकहित की दृष्टि से उन्होंने ऐसी व्यवस्था और नियम-निर्देश कर दिया है कि कोई भी व्यक्ति मात्र थोड़े अध्ययन-अवधान से अपनी कामनानुसार अनुकूल साधना-मार्ग का अवलंब ले सकता है। वैसे, यह बहुत आवश्यक रहता है कि मात्र पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित न रहकर, संबंधित-विषय (मंत्र-तंत्र) के किसी सुयोग्य विद्वान के निर्देशन में उसकी व्यवहार-विधि समझ ली जाए।
कामनाओं का वर्गीकरण :
प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई आवश्यकता (कामना या लालसा) अवश्य होती है। उसकी पूर्ति हेतु किया गया प्रयास कर्म कहलाता है। तंत्र-साधना में, जीवन की आवश्यकता को दस बिंदुओं पर केंद्रित करके उनकी पूर्ति हेतु कर्म (क्रिया) आवश्यक है। अतः अर्थ-बोध की सुविधा के लिए उन सभी बिंदुओं को कर्म की संज्ञा दी गई और प्रयोजन-भेद के आधार पर उनका नामकरण (वर्गीकरण) भी किया गया। इस प्रकार जीवन की समस्त आवश्यकताओं के बोधक दस बिंदुओं को दश-कर्म की संज्ञा दी गई।
दश-कर्म निरूपण :
जिन दश कर्मों के अंतर्गत मानव-जीवन की समस्त कामनाओं को सन्निहित माना गया है, उसके नाम इस प्रकार हैं – 1. शांति कर्म, 2. पुष्टि कर्म, 3. आकर्षण कर्म, 4. मोहन कर्म 5. वशीकरण कर्म, 6. जृम्भण कर्म, 7. उच्चाटन कर्म, 8. स्तंभन कर्म, 9. विद्वेषण कर्म, 10. मारण कर्म।

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