Monday, April 27, 2015

आत्मावलोकन

हम प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखते हैं, लेकिन जो सबसे पहले सीखना चाहिए वो जीवन भर नहीं सीख पाते।
वो है आत्मावलोकन
घर से स्कूल तक। क्लब से सत्संग तक। सभी जगह कोई न कोई विद्वान आपके पीछे लगा हुआ है। भौतिक और आध्यात्मिक सफलता के गुप्त सुत्र बरसा रहा है। सब कुछ सीखा दिया लेकिन यह नहीं बताया कि सब बेकार है अगर आप बाहर कुछ और अन्दर कुछ और की नीति पर चलते रहेंगे। आप धोखा दे सकते हैं अपने मन को, दुनिया को लेकिन उसे नहीं जो सर्वशक्तिमान कहलाता है।
ईश्वर भी कहते हैं उसे।
आपको लगता है आपके पास कोई ऐसी शक्ति है कि ईश्वर को केवल वही पता लगेगा जिससे आपकी सीट स्वर्ग में निश्चित हो। ऐसा चैनल जो केवल आपके द्वारा किये गए अच्छे काम का ही प्रसारण करता है।
लेकिन तब सिग्नल गायब होते हैं जब आप पड़ोसी की सुंदर गाड़ी, पत्नी या शानदार घर को देखकर मन ही मन कुढ़ते हो, उसे कोसते और गालियाँ देते हो। जब सड़क, बाज़ार में दिखाई देती लड़कियों के शरीर को वासना से देखा करते हो। जब किसी के द्वारा छोटी सी बात न मानने पर क्रोध से काँपने लगते हो। जब किसी पर अन्याय होता देख कर भी चुपचाप अपने रास्ते निकल जाते हो। अपने शौक और माता पिता की आवश्यकताओं में प्राथमिकता तय नहीं कर पाते।
दिखावटी धार्मिक कार्यक्रम में सबसे आगे बिलकुल कैमरे के सामने होते हो लेकिन अकेले में दो मिनट भी ईश्वर को आत्मिक स्तर पर याद करने में अक्षम पाते हो।
इन दोषों से मुक्त होने का केवल एक उपाय है - आत्मावलोकन। जब भी समय हो, याद करना अपने मानसिक क्रियाकलाप। कुछ गलत दिखाई दे तो उसे न दोहराने का संकल्प लेना। सुधारने का प्रयास करना।
ये बातें सूई की तरह चुभेंगी, पर दुष्कर्मों और दुष्प्रवृत्तियाँ के फोड़े को फोड़ने के लिये यह चुभन जरूरी है अन्यथा दुष्परिणाम तो भोगने ही पड़ेंगे।
~सचिन्द्र 'अपुर्ण'~

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