मन
आखिर ये है क्या, मन।
मन, जो हमें हमेशा परेशान रखता है।
वेदो, पुराणों, उपनिषदों, नीति ग्रन्थों में इसकी ढेरों विवेचना की गयी है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय में भी विचारकों ने मन के उपर हजारों हजार व्याख्यान दिए।
परन्तु क्या श्रोता समझ सके कि मन का रहस्य है क्या। ये क्या होता है, कहाँ होता है।
मन के गुण धर्म के उपर बहुत कुछ लिखा गया है, बताया गया है। परन्तु मन है क्या?
मन हमारे मस्तिष्क के अवचेतन भाग का वह हिस्सा है जो हमारे व्यक्तित्व का वह रूप होता है जो हमारे जन्मजात गुणों से परिपूर्ण होता है।
बचपन में जब हमने कुछ भी सीखा नहीं होता, तब हम जो भी करते हैं वो केवल मन से प्रेरित होता है। इसी कारण बाल क्रियाएँ निर्मल, निर्दोष होती हैं। धीरे धीरे प्रत्येक बालक का अपने वातावरण के अनुरूप व्यक्तित्व विकास होता जाता है। इस विकास क्रम में जितना ज्यादा नियमन होता है, चेतन मस्तिष्क उतना ज्यादा तार्किक होता जाता है और मन मस्तिष्क की दूरी उतना अधिक बढ़ती जाती है।
यहीं से सारी समस्याओं की शुरुआत होती है।
कोई हमारे सामने परेशान है, जन्मजात परोपकारी का मन उसकी सहायता के लिए उत्सुक हो जाता है परन्तु उसका तार्किक, व्यवहारिक, विश्लेषक मस्तिष्क अपनी शिक्षा के आधार पर दूसरे के झंझट में पड़ने से रोकेगा।
किसी भी व्यक्ति के वास्तविक गुण उसके मन में ही छिपे रहते हैं। और मानव के स्वाभाविक गुण हैं - दया, प्रेम। इनकी अनुपस्थिति या कहा जाए तो इनका दमन से ही क्रूरता, स्वार्थ, घृणा आदि की उत्पत्ति होती है। अत्यधिक व्यवहारिक और भौतिकवाद से जुड़ी शिक्षा मानव के स्वाभाविक गुणों को दबाती चली जाती है।
तो जब भी कोई निर्णय लेना हो, सर्वप्रथम मन की आवाज़ सुननी चाहिए। आखिर आपको भी पता चलना चाहिए कि किस निर्णय से आपके जीवन में शांति बनी रहेगी।
लेकिन अपने मन या आत्मा की आवाज को कैसे पहचाने?
~सचिन्द्र 'अपुर्ण'~
आखिर ये है क्या, मन।
मन, जो हमें हमेशा परेशान रखता है।
वेदो, पुराणों, उपनिषदों, नीति ग्रन्थों में इसकी ढेरों विवेचना की गयी है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय में भी विचारकों ने मन के उपर हजारों हजार व्याख्यान दिए।
परन्तु क्या श्रोता समझ सके कि मन का रहस्य है क्या। ये क्या होता है, कहाँ होता है।
मन के गुण धर्म के उपर बहुत कुछ लिखा गया है, बताया गया है। परन्तु मन है क्या?
मन हमारे मस्तिष्क के अवचेतन भाग का वह हिस्सा है जो हमारे व्यक्तित्व का वह रूप होता है जो हमारे जन्मजात गुणों से परिपूर्ण होता है।
बचपन में जब हमने कुछ भी सीखा नहीं होता, तब हम जो भी करते हैं वो केवल मन से प्रेरित होता है। इसी कारण बाल क्रियाएँ निर्मल, निर्दोष होती हैं। धीरे धीरे प्रत्येक बालक का अपने वातावरण के अनुरूप व्यक्तित्व विकास होता जाता है। इस विकास क्रम में जितना ज्यादा नियमन होता है, चेतन मस्तिष्क उतना ज्यादा तार्किक होता जाता है और मन मस्तिष्क की दूरी उतना अधिक बढ़ती जाती है।
यहीं से सारी समस्याओं की शुरुआत होती है।
कोई हमारे सामने परेशान है, जन्मजात परोपकारी का मन उसकी सहायता के लिए उत्सुक हो जाता है परन्तु उसका तार्किक, व्यवहारिक, विश्लेषक मस्तिष्क अपनी शिक्षा के आधार पर दूसरे के झंझट में पड़ने से रोकेगा।
किसी भी व्यक्ति के वास्तविक गुण उसके मन में ही छिपे रहते हैं। और मानव के स्वाभाविक गुण हैं - दया, प्रेम। इनकी अनुपस्थिति या कहा जाए तो इनका दमन से ही क्रूरता, स्वार्थ, घृणा आदि की उत्पत्ति होती है। अत्यधिक व्यवहारिक और भौतिकवाद से जुड़ी शिक्षा मानव के स्वाभाविक गुणों को दबाती चली जाती है।
तो जब भी कोई निर्णय लेना हो, सर्वप्रथम मन की आवाज़ सुननी चाहिए। आखिर आपको भी पता चलना चाहिए कि किस निर्णय से आपके जीवन में शांति बनी रहेगी।
लेकिन अपने मन या आत्मा की आवाज को कैसे पहचाने?
~सचिन्द्र 'अपुर्ण'~

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